Wednesday, May 21, 2008
भारतीय अंक प्रणाली
देवनागरी अंक
नीचे देवनागरी अंकों के नाम व प्रकार दिये जा रहे हैंदेवनागरी अंकअरेबिक/यूरोपियनअंकशब्दों मेंउच्चारण 00शून्य१1एक२2दो३3तीन४4चार५5पाँच६6छः७7सात८8आठ९9नौ
उद्गम
इतिहासकारों के अनुसार ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में भारत में ब्राह्मी अंकों का प्रचलन था। पुणे एवं मुंबई के क्षेत्र की गुफाओं में मिले शिलालेखों में तथा उत्तर प्रदेश में मिले प्राचीनकाल के सिक्कों में ब्राह्मी अंक पाये गये हैं। ब्राह्मी अंकों में दशमलव प्रणाली तथा शून्य का प्रयोग नहीं होता था।
दशमलव प्रणाली
अप्रामाणिक दस्तावेज़ों के अनुसार भारत में शून्य, जो कि दशमलव प्रणाली का आधार है, का आविष्कार इस्वी सन् की प्रथम शताब्दी में हो चुका था। किन्तु भारत में शून्य के आविष्कार के प्रामाणिक दस्तावेज़ पाँचवी शताब्दी में ही मिले हैं। ग्वालियर में पाये गये शिलालेख, जो कि ईस्वी सन् 870 का है, में शून्य के संकेत पाये गये हैं। इस शिलालेख को सभी इतिहासकारों ने एक मत से मान्यता दी है।
शून्य के आविष्कार हो जाने पर भारत में दस अंको वाली अंक प्रणाली का प्रचलन आरम्भ हो गया जो कि इस संसार में प्रचलित आधुनिक अंक प्रणालियों का आधार बनी।
भारतीय अंक प्रणाली का अरब के द्वारा अभिग्रहण
ईस्वी सन् के सातवीं शताब्दी में अरब ने भारतीय अंक प्रणाली का अभिग्रहण कर लिया। अरब में भारतीय अंकों को गुबार अंक और भारतीय अंक प्रणाली को हिंदुसा अंक प्रणाली के नाम से जाना जाने लगा। हिंदुस्तान से इस अंक प्रणाली के प्राप्त होने के कारण ही वहाँ इसे हिंदुसा नाम दिया गया।
अरब के अल-किफ्ती नामक विद्वान के कालक्रम विवरण के अनुसार "कैलिफ-अल-मन्सूर (सन् 776) के दरबार में भारत से एक विद्वान आया जो सिद्धांत शास्त्र तथा खगोल शास्त्र का प्रकांड पण्डित था। वह समीकरण के द्वारा गणना करना भी जानता था। उसे कैलिफ-अल-मन्सूर ने अरब में भारतीय गणित पद्धति की शिक्षा के लिये नियुक्त किया ......."
यूरोपियन देशों के द्वारा अभिग्रहण
अन्य यूरोपियन देशों ने भारतीय अंक प्रणाली को अरब से सीखा। चूँकि उन्हें यह अंक प्रणाली अरब से मिली थी इसलिये उन्होंने इसका नाम अरेबिक अंक प्रणाली रख दिया। कालान्तर में इसका नाम हिंदू-अरेबिक अंक प्रणाली हो गया।
विद्वान गणितज्ञ लाप्लास के विचार
फ्रांस के प्रसिद्ध गणितज्ञ पियरे साइमन लाप्लास के अनुसार "भारत ने संख्याओं के प्रदर्शन के लिये दस अंकों वाली एक अति निपुण प्रणाली दिया है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि यदि इस प्रणाली के अन्य गुणों की उपेक्षा भी कर दी जाये तो भी इसका सरलतम होने कदापि अस्वीकार नहीं किया जा सकता
वर्तमान स्वरूप
समय समय में तथा देश देश में भारतीय अंक प्रणाली के अंकों के संकेत में अनेक परिवर्तन हुये। अन्त में इन अंकों का स्वरूप 0, 1, 2, 3,.... के रूप में हो गया और इन्हें अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिल गई।
आधुनिक अंक एवं अंक प्रणाली वास्तव में भारतीय ही हैं। वर्तमान में इन आधुनिक अंकों को "भारतीय अंकों का अन्तर्राष्ट्रीय रूप" (International form of Indian Digits) के नाम से जाना जाता है।
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Tuesday, May 20, 2008
हिंदू शब्द की व्युत्पत्ति
कालान्तर में भारतवर्ष में मुगलों का शासन हो जाने के कारण देवभाषा संस्कृत का ह्रास हो गया तथा सनातन धर्म की अवनति होने लगी। इस स्थिति को सुधारने के लिये विद्वान संत तुलसीदास ने प्रचलित भाषा में धार्मिक साहित्य की रचना करके सनातन धर्म की रक्षा की।
19वीं शताब्दी के पूर्व तक हिंदू शब्द था ही नहीं, हिंदू शब्द अंग्रेजों की देन है। जब औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन को ईसाई, मुस्लिम आदि धर्मों के मानने वालों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिये जनगणना करने की आवश्यकता पड़ी तो सनातन शब्द से अपरिचित होने के कारण उन्होंने यहाँ के धर्म का नाम सनातन धर्म के स्थान पर हिंदू धर्म रख दिया।
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अपने व्यक्तित्व का विकास कैसे करे
किसी भी मनुष्य की पहचान उसके व्यक्तित्व से ही होती है। प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी को कभी भी असफलता का मुख नहीं देखना पड़ता, वे आसानी के साथ दूसरों को प्रभावित कर लेते हैं तथा उन्हें अपना मित्र बना लेते हैं।
नीचे कुछ बातें दी जा रही हैं जिनकी सहायता से हम अपने व्यक्तित्व का विकास करके स्वयं को प्रभावशाली कैसे बना सकते हैं:
दूसरों के प्रति स्वयं का व्यवहार
दूसरों को अपमानित न करें और न ही कभी दूसरों की शिकायत करें। याद रखें कि अपमान के बदले में अपमान ही मिलता है।
दूसरों में जो भी अच्छे गुण हैं उनकी ईमानदारी के साथ दिल खोल कर प्रशंसा करें। झूठी प्रशंसा कदापि न करें। यदि आप किसी की प्रशंसा नहीं कर सकते तो कम से कम दूसरों की निन्दा कभी भी न करें। किसी की निन्दा करके आपको कभी भी किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल सकता उल्ट आप उसकी नजरों गिर सकते हैं।
अपने सद्भाव से सदैव दूसरों के मन में अपने प्रति तीव्र आकर्षण का भाव उत्पन्न करने का प्रयास करें।
सभी को पसंद आने वाला व्यक्तित्व
दूसरों में वास्विक रुचि लें। यदि आप दूसरों में रुचि लेंगे तो दूसरे भी अवश्य ही आप में रुचि लेंगे।
दूसरों को सच्ची मुस्कान प्रदान करें।
प्रत्येक व्यक्ति के लिये उसका नाम सर्वाधिक मधुर, प्रिय और महत्वपूर्ण होता है। यदि आप दूसरों का नाम बढ़ायेंगे तो वे भी आपका नाम अवश्य ही बढ़ायेंगे। व्यर्थ किसी को बदनाम करने का प्रयास कदापि न करें।
अच्छे श्रोता बनें और दूसरों को उनके विषय में बताने के लिये प्रोत्साहित करें।
दूसरों की रुचि को महत्व दें तथा उनकी रुचि की बातें करें। सिर्फ अपनी रुचि की बातें करने का स्वभाव त्याग दें।
दूसरों के महत्व को स्वीकारें तथा उनकी भावनाओं का आदर करें।
अपने सद्विचारों से दूसरों को जीतें
तर्क का अंत नहीं होता। बहस करने की अपेक्षा बहस से बचना अधिक उपयुक्त है।
दूसरों की राय को सम्मान दें। 'आप गलत हैं' कभी भी न कहें।
यदि आप गलत हैं तो अपनी गलती को स्वीकारें।
सदैव मित्रतापूर्ण तरीके से पेश आयें।
दूसरों को अपनी बात रखने का पूर्ण अवसर दें।
दूसरों को अनुभव करने दें कि आपकी नजर में उनकी बातों का पूरा पूरा महत्व है।
घटनाक्रम को दूसरों की दृष्टि से देखने का ईमानदारी से प्रयास करें।
दूसरों की इच्छाओं तथा विचारों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनायें।
दूसरों को चुनौती देने का प्रयास न करें।
अग्रणी बनें: बिना किसी नाराजगी के दूसरों में परिवर्तन लायें
दूसरों का सच्चा मूल्यांकन करें तथा उन्हें सच्ची प्रशंसा दें।
दूसरों की गलती को अप्रत्यक्ष रूप से बतायें।
आपकी निन्दा करने वाले के समक्ष अपनी गलतियों के विषय में बातें करें।
किसी को सीधे आदेश देने के बदले प्रश्नोत्तर तथा सुझाव वाले रास्ते का सहारा लें।
दूसरों के किये छोटे से छोटे काम की भी प्रशंसा करें।
आपके अनुसार कार्य करने वालों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन करें।
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Monday, May 19, 2008
छत्तीसगढ़ - एक अत्यन्त प्राचीन क्षेत्र
भारत में दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनका नाम विशेष कारणों से बदल गया - एक तो 'मगध' जो बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण "बिहार" बन गया और दूसरा 'दक्षिण कौशल' जो छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने के कारण "छत्तीसगढ़" बन गया। किन्तु ये दोनों ही क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं। "छत्तीसगढ़" तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके भग्वावशेष इंगित करते हैं कि यहाँ पर वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध के साथ ही अनेकों आर्य तथा अनार्य संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा है।
छत्तीसगढ़ का पौराणिक महत्व
छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कोशल, जिसका विस्तार पश्चिम में त्रिपुरी से ले कर पूर्व में उड़ीसा के सम्बलपुर और कालाहण्डी तक था, का एक हिस्सा है और इसका इतिहास पौराणिक काल तक पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कोशल' प्रदेश, जो कि कालान्तर में 'उत्तर कोशल' और 'दक्षिण कोशल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया, का 'दक्षिण कोशल' ही वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। इस क्षेत्र के महानदी (जिसका नाम उस काल में 'चित्रोत्पला' था) का मत्स्यपुराण तथा महाभारत के भीष्म पर्व में वर्णन है -
"चित्रोत्पला" चित्ररथां मंजुलां वाहिनी तथा।मन्दाकिनीं वैतरणीं कोषां चापि महानदीम्।।"- महाभारत - भीष्मपर्व - 9/34
"मन्दाकिनीदशार्णा च चित्रकूटा तथैव च।तमसा पिप्पलीश्येनी तथा चित्रोत्पलापि च।।"(मत्स्यपुराण - भारतवर्ष वर्णन प्रकरण - 50/25)
"चित्रोत्पला वेत्रवपी करमोदा पिशाचिका।तथान्यातिलघुश्रोणी विपाया शेवला नदी।।"(ब्रह्मपुराण - भारतवर्ष वर्णन प्रकरण - 19/31)
वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा महानदी का स्पष्ट उल्लेख है। यहाँ स्थित सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने वाले श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्र्येष्टि यज्ञ करवाया था जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। इस दृष्टि से राम को धरती पर लाने का प्रमुख श्रेय छत्तीसगढ़ को ही प्राप्त है। राम के काल में यहाँ के वनों में ऋषि-मुनि-तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की अवधि में राम यहाँ आये थे।
प्रतीत होता है कि राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश काव्य में उल्लेख है कि राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। यदि शरावती और श्रावस्ती को एक मान लिया जाये तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश दक्षिण कोशल के शासक बने। सम्भवतः उनकी राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी, शायद कोसला ग्राम ही उस काल की कुशावती थी। यदि कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि मान लिया जावे तो भी किसी प्रकार की विसंगति प्रतीत नहीं होती। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिये विन्ध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोशल में ही था।
उपरोक्त सभी उद्धरणों से स्पष्ट है कि हमारा छत्तीसगढ़ आदिकाल से ही ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों का पावन तपोस्थल रहा है।
रामायण कालीन छत्तीसगढ़
ऐसे अनेकों तथ्य हैं जो इंगित करते हैं कि ऐतिहासिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ प्रदेश की प्राचीनता रामायण युग को स्पर्श करती है। उस काल में दण्डकारण्य नाम से प्रसिद्ध यह वनाच्छादित प्रान्त आर्य-संस्कृति का प्रचार केन्द्र था। यहाँ के एकान्त वनों में ऋषि-मुनि आश्रम बना कर रहते और तपस्या करते थे। इनमें वाल्मीकि, अत्रि, अगस्त्य, सुतीक्ष प्रमुख थे इसीलिये दण्डकारण्य में प्रवेश करते ही राम इन सबके आश्रमों में गये।
प्रतीत होता है कि छोटा नागपुर से लेकर बस्तर तथा कटक से ले कर सतारा तक के बिखरे हुये राजवंशों को संगठित कर राम ने वानर सेना बनाई हो। आर.पी. व्हान्स एग्न्यू लिखते हैं, "सामान्य रूप से इस विश्वास की परम्परा चली आ रही है कि रतनपुर के राजा इतने प्राचीनतम काल से शासन करते चले आ रहे हैं कि उनका सम्बन्ध हिन्दू 'माइथॉलाजी' (पौराणिक कथाओं) में वर्णित पशु कथाओं (fables) से है। (चारों महान राजवंश) सतारा के नरपति, कटक के गजपति, बस्तर के रथपति और रतनपुर के अश्वपति हैं" (A Reeport on the Suba or Province of Chhattisgarh - written in 1820)। अश्व और हैहय पर्यायवाची हैं। श्री एग्न्यू का मत है कि कालान्तर में 'अश्वपति' ही हैहय वंशी हो गये। इससे स्पष्ट है कि इन चारों राजवंशो का सम्बन्ध अत्यन्त प्राचीन है तथा उनके वंशों का नामकरण चतुरंगिनी सेना के अंगों के आधार पर किया गया है।
बस्तर के शासकों का 'रथपति' होने के प्रमाण स्वरूप आज भी दशहरे में रथ निकाला जाता है तथा दन्तेश्वरी माता की पूजा की जाती है। यह राम की उस परम्परा का संरक्षण है जब कि दशहरा के दिन राम ने शक्ति की पूजा कर लंका की ओर प्रस्थान किया था। यद्यपि लोग दशहरा को रावण-वध की स्मृति के रूप में मनाते हैं किन्तु उस दिन रावण का वध नहीं हुआ था वरन उस दिन राम ने लंका के लिये प्रस्थान किया था। (दशहरा को रावण-वध का दिन कहना ठीक वैसा ही है जैसे कि संत तुलसीदास के 'रामचरितमानस' को 'रामायण' कहना।)
राजाओं की उपाधियों से यह स्पष्ट होता है राम ने छत्तीसगढ़ प्रदेश के तत्कालीन वन्य राजाओं को संगठित किया और चतुरंगिनी सेना का निर्माण कर उन्हें नरपति, गजपति, रथपति और अश्वपति उपाधियाँ प्रदान की। इस प्रकार रामायण काल से ही छत्तीसगढ़ प्रदेश राम का लीला स्थल तथा दक्षिण भारत में आर्य संस्कृति का केन्द्र बना।
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Saturday, May 17, 2008
आप भी सफल लेख लिख सकते हैं!
किंतु मैं आपको बताना चाहता हूँ कि ऐसा बिल्कुल ही नहीं है - आप अवश्य ही बहुत अच्छा लेख लिख सकते हैं।
क्या आपको विश्वास नहीं हो रहा है?
तो इस लेख को पूरा पढ़ जाइये, पढ़ने के बाद आपको स्वयं लगने लगेगा कि आपका अपने विषय में मिथ्या धारणा है वह चटक कर टूटने लगी है।
सबसे पहले तो आप दूसरों के द्वारा लिखे गये लेखों, कहानियों आदि को, जितना भी अधिक हो सकता है, पढ़िये। जितना अधिक आप पढ़ेंगे, उतना ही अधिक आप सीखेंगे भी।
बच्चों के लिये लिखी गई कहानियाँ पढ़ने से शुरू कीजिये। इन कहानियों से आपकी कल्पनाशीलता में वृद्धि होगी। कुछ रचनात्मकता भी आपमें जागृत होगी।
पढ़िये.....सीखिये.....लिखिये..... पढ़िये.....सीखिये.....लिखिये..... पढ़िये.....सीखिये.....लिखिये.....
यह एक अन्तहीन प्रक्रिया है।
आपको इंटरनेट में इस जैसे और भी लेख मिलेंगे जो कि लेख लिखने के विषय में जानकारी देते हैं। उन्हें भी खोज-खोज कर पढ़िये।
इस प्रकार से पढ़ते रहने तथा समय-समय पर लिखते रहने का अभ्यास करने से आपमें अच्छे लेख लिखने की क्षमता का विकास होना आरम्भ हो जायेगा। याद रखिये रहीम कवि ने भी कहा है -
करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते, सिल पर पड़त निसान॥
हाँ तो कुछ अभ्यास हो जाने के बाद अपना एक चिट्ठा शुरू कर दीजिये (गँठजोड़ में चिट्ठा लिखने की सुविधा का भरपूर उपयोग कीजिये) और नियमित रूप से उसमें लिखते रहिये। इस प्रकार से लिखना आपके लिये आसान से आसानतर होता जायेगा।
अपने दिमाग से इस भय को निकाल फेंकिये कि आप अच्छा लेख नहीं लिख सकते या आपके लेख को कोई पसंद नहीं करेगा। यदि आप अपने चिट्ठे में स्टेटकाउंटर लगा देंगे तो आपको स्वयं ही पता चल जायेगा कि आपके चिट्ठे को पढ़ने वालों की संख्या में दिनोदिन वृद्धि होती जा रही है। इस तरह से आपका मनोबल भी बढ़ता जायेगा।
निम्न लिखित बातों पर ध्यान रखने से आपके लेख की गुणवत्ता बढ़ेगीः
छोटे वाक्यों तथा परिच्छेदों (paragraphs) का प्रयोग करें। जिन बातों को आप अधिक महत्व देना चाहते हैं उन्हें बड़े तथा उभरे हुये अक्षरों में प्रदर्शित करें। सरल भाषा का प्रयोग करें। बड़े-बड़े तथा कठिन शब्दों से बचने की कोशिश कीजिये। दिमाग से भय तथा निराशा को निकाल फेंकिये। आत्मविश्वास बनाये रखिये।
याद रखिये आप अवश्य ही सफल होंगे। हो सकता है कि शुरू-शुरू के कुछ दिनों में आपको कुछ निराशा मिले किन्तु कभी भी निराश होकर लिखना मत छोड़िये।
इसके साथ ही साथ दूसरों के द्वारा लिखे गये लेखों का अधिक से अधिक अध्ययन कीजिये। इस बात को ध्यान दीजिये कि मैं पढ़ने के लिये नहीं कह रहा हूँ बल्कि अध्ययन करने के लिये कह रहा हूँ। अध्ययन में पढ़ने के अलावा उसे समझना तथा उस पर मनन और चिंतन करना भी शामिल होता है। गौर से सोचिये कि उन लेखकों ने अपना लेख शुरू कैसे किया है, अपने विचारों को प्रस्तुत करने का उनका तरीका क्या है, किस प्रकार की भाषा का उपयोग वे करते हैं, आदि-आदि।
हाँ, तो जितना अधिक आप अध्ययन करेंगे, उतना ही अधिक आप लेख लिखने के विषय में सीखते जायेंगे।
सदैव सरल, लोगों कों आसानी से समझ आने वाले तथा बोलचाल की भाषा वाले शब्दों का प्रयोग कीजिये।
मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं!
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बाल विज्ञान कथा - छोटी सी बात
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Thursday, May 15, 2008
एक प्रेरणा आपके लिये....
स्वास्थय के प्रति जागरूक रहिये सुख का पहला पायदान यही है। शांति को हर हाल में बरकरार रखिये समृद्धि की असली ताकत यही है।
बीज बनाना कुदरत का काम है पर उन बीजों से फुल खिलाना आप के हाथ में है।
असफल हो गये तो हार मत खाइये असफतला का अर्थ है फल के पकने में अभी और वक्त लगना बाकी है धीरज रखिये और फिर से लग जाइये।
